बकरे की आखे { funny poem}

by divyanshu deep
                                                              this poem makes no sense  just like Indian politics

सुबह उठा तो  मैने क्या पाया, मेरी  कुछ  समझ मे नही आया
देखता हूँ  तो  क्या पाता  हूँ ,मै शाम को नहाने जाता हूँ

कोई कुछ भी कहे मुझे उस का क्या करना
लोग हमेशा कहते है वरना वरना वरना

काव्य के  अंतर मन से रसः चूस निकालुगा
अगर कुछ समझ मे नही आया तो  आखो मे काजल  लगा लू गा

समुन्दर का पानी कोई पी नही सकता
उस ही प्रकार एक कवि कविता लिखे बिना जी नही सकता

लेला ने कहा मजनू   के कान मे
कुलचे खाना सोनू की दुकान मे

कॉल करे या हमारी शाखा  मे आये
जितना दिमाग हो केवल  उतना ही लगाये

इस कविता का सार यदि समझ मे नही आया थो पागल मत हो जाना
जितना दिमाग बचा है उसे  पढ़ायी मे  लगाना

इस कविता मे मतलब ढूँढने की कोशिश तुम न कर बैठान
बैठान थो केवल इसे पढने  बैठान

इस कविता का सार यदि तुम्हे समझ मे आ जाए थो मुझे समझा देना
नही थो अपना घंटा खुद बजा ले ना

told by divyanshu deep
                         Chennai days

A politician will do anything to keep his job – even become a patriot.

Advertisements

One thought on “बकरे की आखे { funny poem}”

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s